मैं जो कुछ हूँ
माँ प्रकृति से हूँ
प्रकृति ने ही मुझे गढ़ा
अपनी मिट्टी से
आकाश से
जल से
हवा से
और धूप से
मेरी रगो में बहता लहू
मेरी श्वास में आती प्राणवायु
सबकुछ मुझे प्रकृति ने
अपनी गोद में लेकर
बड़े प्यार से दिया है।
चारों ओर घिरे पहाड़ों ने
बहते झरनों और नदियों ने
खुले आसमान से
बरसते बादलों ने
चमकते सूर्य और
चंद्रमा की चाँदनी ने
मुझमें किया है
शक्ति का संचार
दिया है आकार
मैं कृतज्ञ हूँ
प्रकृति की
पर यह सोच
चिंतित भी हूँ कि
प्रकृति माँ की गोद में
क्या खेल पाएंगी
हमारी आने वाली
पीढ़ियाँ ???


