पढ़ना सीखो
शब्दों को न सही,
किताबों को भी नहीं,
अनुभवों को,
खामोशियों को,
आँखों को,
लफ़्ज़ों के पीछे छिपे अर्थों को
क्योंकि अक्षरों को पढ़कर
लोग किताबों से गुर सीखते हैं
लेकिन जिंदगी को पढ़कर
जीने के गुर वही सीख पाते हैं
जो वह भी पढ़ लें
जिसके लिए कुछ नहीं लिखा जाता
जहाँ शब्दों की सीमा ख़त्म हो जाती है
और जीवन का अर्थ
असीम में फैलता जाता है
मुझे लगता है
उसे पढ़ना सीख लूँ तो
शायद जिंदगी की पाठशाला के
इम्तहान पास कर सकूँ...
गीता टण्डन
9.2.21


