शहर से गाँव जाने तक का सफ़र,
रेल का डिब्बा भी हो जाता था घर।
वो मिट्टी की सुराही,ताड़ का पंखा,
वो खुशी से चढ़ना चाचा का कंधा।
होती है सुंदर बचपन की दुनिया,
नानी के घर बितती हर छुट्टियाँ।
धूल में लिपटे होते ख्वाब हमारे,
बनाते थे मिट्टी के महल सितारे।
कागज़ की नाव चलती पानी की राह,
हर छोटी चीज़ की होती बड़ी चाह।
खिलौनों से ज़्यादा होते थे रिश्ते प्यारे,
बचपन के दोस्त लगते थे सबसे न्यारे।
पेड़ों से बातें करना,तारों को गिनना,
बितती न रात दादी की कहानी बिना।
धूल भरे पाँव, पसीने से गीले कपड़े,
लेकिन दिल होते सबके ख़ज़ाने से बड़े।
अब तो वो दिन बस यादें बनकर रह गए,
दिल के किसी कोने में चुपचाप दब गए।
काश!एक बार फिर वो लम्हे लौट आएँ,
जहाँ सपने भी मिट्टी में फूल बन जाएँ।


