ऐ हुस्न-ए-जहाँ ये तेरी मोहब्बत का असर हैं

तेरे इनशेख़ाक पर ये आँखें  चश्म-ए-तर  हैं


मैं तुम्हारे हुस्न कि क्या मिसाल दूं  आख़िर

देखो तुम्हारी आँखें तो सारे नशे बे-असर हैं


सैर करना चाहता हूं  ये सारा जहाँ मगर

बिना  हम-सफ़र  के ये  कैसा  सफ़र   हैं


सारी उम्र  छुप-छुप कर देखते रहे उसको

अब वो सामने हैं तो किस बात का डर हैं


ज़बा चाशनी आँखों पर गुस्सा नज़र आ रहा

शाह-जा़दी ये बात मनवाने का कैसा हुनर हैं


हैदर   से    पूछो    दर्द-ए-मोहब्बत   क्या    हैं

जिसको देखकर मख़मूर हुआँ वही बे-ख़बर हैं


इनशेख़ाक- जुदाई


मख़मूर - नशे में चूर