यायावर सा है जीवन


कितना भी ढूंढो खुद को

प्रेम, घृणा, रिश्ते बनते हैं क्षणिक यहाँ 

जरूरत के मुताबिक 

शाश्वत कुछ भी नहीं 

सार्थक कुछ भी नहीं 

निरर्थक कुछ भी नहीं 

न ठिकाना है कोई

न बहाना है कोई

जब वक्त हो चलेगा

तो किरदार को समेटना पड़ेगा

अभिनय होगा 

अनुभव भी होगा

जनम लोगे

बचपन होगा, जवानी होगी

प्रणय होगा, विरक्ति भी होगी

बुढ़ापा होगा

और फिर अंत भी

क्या ये यात्रा नहीं 

मैं से उस तक की

शून्य से शाश्वत तक की

तम से प्रकाश की

कुछ भी स्थिर कहाँ? 

न तन और न मन

बस एक सफर है

मगर ठिकाने कई और हैं

रिश्ते हैं और निभाने कई और हैं 

फकीर के सदृश रमता है यह मन

यह जो जीवन है

यायावर सा है जीवन 


~गौतम @gautam0112