वह भी तो इंसान ही है

सृष्टि के बीजों को

मेहनत की खाद से

सींचकर पसीने के पानी से

बोता है फसल सृष्टि के सपनों की

सृष्टि की संतानों के लिए

कुछ उम्मीदों को पालकर

कि जब मेहनत को काटेगा

तो भाग्य की फसल तैयार होगी

पर वह बाजार

उसकी उम्मीदों को

उसके बच्चों के खिलौनों को 

उसकी पत्नी की साड़ी को

छीन लेता है

लौटता है बस मायूस होकर

फिर प्रारब्ध को बोने के लिए 

तैयार हो जाता है

बीज, फावड़ा, हल और कुदाल लेकर

नयी उम्मीद के साथ!!

~गौतम @gautam0112