निकाल लो न पाँव अपने

उड़ चलो विहग बन

स्वच्छंद उस क्षितिज तक

न धरती का बंधन हो

न गगन का अनंत

अस्तित्व है न तुम्हारा भी कुछ 

शून्य से एक तक तो चलो

कुछ वैदेही सा

कुछ राधा सा

कुछ मीरा सा

तोड़ दो लक्ष्मण रेखा भी

सक्षम हो न कि रावण 

का पाखंड भंग कर सको

तुम बिन तो भगवान भी अधूरा सा

तुम बिन न राम पूरे हुए

न कृष्ण ही

फिर कैसे खुद को हीन मान बैठी

क्या अस्तित्व है सृष्टि का 

तुम बिन 

बोलो न

पहचान लो न खुद को

लड़ो न महाभारत खुद की

गढ़ो न रामायण स्वयं 

लड़ो न यम से अपने लिए

तोड़ दो न बेड़ियों में जकड़े अपने मौन को

उठा लो न तलवार

बनो न दुर्गा तुम

उठा लो न कलम

लिख डालो खुद को

चलाओ न हल

बो दो बीज अपने भाग्य के

शिल्पी भी तुम हो

ढाल दो न अपने सांचे में 

समूचा यह संसार

माँ हो तुम 

बहन हो

पत्नी हो

बेटी हो

तुमसे ही तो हम हैं 

तुम्हारा ही तो अंश हैं 

फिर बन जाओ न अधिष्ठात्री 

जीवन को थाम लो

सँवार दो न हमें 

~गौतम @gautam0112