बहुत उदासी जब आती है
साँस मेरी जब थम जाती है
और हौंसले जब मेरे
शीशे की तरह चटक जाते हैं
तब वह लड़की याद आती है।
पहली बार ट्रेन में देखा
छोटी, नटखट, बदनसीब थी
शायद वह सबसे गरीब थी
खेल दिखाती, गाने गाती
और चार पैसे पा जाती
अक्सर जब मैं घर जाता था
उसका चेहरा दिख जाता था
लम्बी चोटी उसकी लेकिन
करतब का एक जरिया होती
ऐसे अपनी किस्मत के
कुछ कच्चे पक्के दाने बोती
मन में बेसक कितना ही
सैलाब भरा था
लेकिन उसका चेहरा इतना
दमक रहा था
नहीं शिकन थी माथे पर
बेफिक्र बड़ी थी
शायद वह छोटी थी
फिर भी बहुत बड़ी थी!!
जीवन जीना सीख रहा हूँ
उसके जैसे
अब बोलो अपनी किस्मत को
तोलूँ कैसे
अन्दर से बेशक कुछ भी हो
अक्सर याद दिलाती है
तब वह लड़की याद आती है।
~गौतम


