हे पुरुष संदेह त्यागो

सो रहे थे नींद त्यागो

नारियों के मौन को

दुर्बल न समझो

और उनके ओज को 

यूँ कम न समझो


   शक्ति की जो साधना है

    विश्व की आराधना है

    उसकी करुणा विश्व की

    ममतामयी सद्भावना है


जगत की जननी वही है

सृष्टि का आधार भी है

रश्मियों के तेज से

इस जगत में साकार भी है


तुम उसे करके प्रताड़ित 

पतन अपना कर रहे हो

माँ की ममता के शिखर को

तुम कलंकित कर रहे हो


संगिनी भी वो प्रखर है

 धैर्य का ऊँचा शिखर है

 ठान ले यमराज को भी

जीत ले इतनी निडर है


अटल सावित्री के जैसी

सबल है दुर्गावती सी

आन की जब बात हो तो

जल गयी पद्मावती सी


 प्रेम में है राधिका सी

  भक्ति में है साधिका सी

  है प्रकाशित चन्द्रमा सी

   जल रही है वर्तिका सी


अनवरत् है शक्ति उसकी

शाश्वत है भक्ति उसकी

क्रोध में काली है वो

पर सतत है अनुरक्ति उसकी


 पर सिया का अपहरण

 और द्रौपदी का मान तोड़ा

  राम बनकर तुम लड़े फिर

  सिया को क्यों वन में छोड़ा? 


स्त्री मन की तुम्हारी 

मलिनता में क्यों जली हैं

सती जैसी कुप्रथाएं

इन युगों में क्यों फली हैं 


 क्यों तिरस्कृत इस जगत में 

 हे पुरुष! यह नारियां हैं 

 देवदासी के सदृश क्यों 

 सह रहीं दुश्वारियां हैं 


भ्रुण हत्या की अगन है

यौन शोषण में जली है

और लालच के शहर में 

अम्ल बनकर वह गली है


मातृशक्ति वह प्रखर थी

मौन था श्रृंगार उसका

 तुम नहीं पर जान पाये

 दिव्यतम आकार उसका


स्त्री का मौन दुर्बलता नहीं है

स्त्री के त्याग को बलिदान समझो

हे पुरुष ब्रह्मांड की तेजस्विनी को

सृष्टि का अनमोल तुम वरदान समझो!! 

    

  ~गौतम