पर्वत की मैं राजदुलारी

शादी करके विदा हुई हूँ 

उस खारे से दूल्हे पर

मैं बचपन से ही फिदा हुई हूँ 


पर यह रस्ता दुर्गम सा है

तन मेरा छलनी होता है

कंकड़ पत्थर ढोते ढोते

मन मेरा बोझिल होता है 


कभी मेरी लहरें रोती हैं 

कभी बहुत उफनाती हूँ मैं 

अपनी सारी यादों को

अपने जल में दफनाती हूँ मैं 


कभी सीचती खेतों को हूँ 

कभी मलिन हो जाती हूँ मैं 

कभी पनघटों के कोनों में 

होकर खिन्न लिपट जाती हूँ 


कितनी ही संस्कृतियों को

अपनी घाटी में सींच रही हूँ 

और साक्षी हूँ हर क्षण की

हो उद्विग्न सिमट जाती हूँ 


ऐसी है बारात मेरी

बाराती भी मैं स्वयं अकेली

रस्ते में मिल जाती हैं 

छोटी छोटी कुछ और सहेली 


पर मैं अपने चुने प्रेम से

अब जल्दी ही मिल जाऊँगी

और उसी में लीन नदी बन

मैं भी खारी हो जाऊँगी

~गौतम ✍️ @gautam0112