माँ प्रकृति जब सिमटकर आंचल सजाती हैं 

तब धरा के ह्रदय में अनुराग पलता है!!


थक गयी थी धूप भी धरती गगन की यात्रा से, 

बादलों ने बरसकर उसको भिगोया है।

चहककर हारी थकी जल की फुहारों से

भीगकर इस धूप ने आंचल संजोया है। 


जिन्दगी फेहरिस्त है लम्बी मगर

ख्वाहिशें इतनी सी थीं जी लूँ उन्हें!!!


मेघ प्रेयसी के बाल, भाल और कपोल बसयँ,

अधरन की प्यास घटे घटा की तरंग से। 

"मुग्ध" होयँ प्रियतम के प्रेम के सरोवर से,

भीगि जायँ अंग संग प्रेयसी के रंग से।।


निशि दिन मैं आकाश ओढ़कर खुद को ही आभास करूँ

प्रेम सिंधु में स्वयं डूबकर सकल धरा आकाश करूँ।


समर सज्जित और रण कौशल चरम की ओर होगा

आज बैरी सूक्ष्मतम है रण बड़ा घनघोर होगा

आत्म बल और मन की सारी शक्तियाँ साकार करना

रण विजय निश्चित तुम्हारी और जय उदघोष होगा.



~गौतम