
अब मुरली का संगीत नहीं
अब पांचजन्य का नाद करो
इस बंजर सी मानवता को
हे वासुदेव आबाद करो
मानव मानव का भक्षक है
भाई भाई का मीत नहीं
चहुँ ओर धधकती ज्वाला में
तुम जैसा है मनमीत नहीं
कितनी द्रौपदियाँ जलती हैं
हर रोज तमाशे होते हैं
मानव की अंधी बस्ती में
लाचार भूख से रोते हैं
भेड़िये घूमकर बस्ती में
मानवता रोज जलाते हैं
जो झूठे हैं इस बस्ती में
केवल वो पूजे जाते हैं
जो शोषित हैं जो वंचित हैं
उनका कोई हमराह नहीं
जुल्मों के इस अंधियारे में
उनको प्रकाश की चाह नहीं
अब लालच
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