किसान
सबका प्रतिपालक
सृष्टि का पालनहार
इसलिए कि वह ब्रह्मांड को
बीज में समेट लेता है
जहाँ जीवन की फसल उगती है
वह लेखक भी है विशिष्ट
खेत के पन्नों पर
हल की कलम से
पसीने की स्याही से
लिखता है फसल इस जीवन की
और पलती है सृष्टि तब
और फिर कितनी ही
ऋचाएं निर्मित होती हैं
अंत से अनंत तक
वेदों के गीत बनकर
जहाँ बरसता है जीवन
सावन बनकर
स्वाति से सीपियों में
मोतियां बनकर
हम तक
क्षुधा की प्रतिपूर्ति के लिए
निवालों का आकार लेकर
और वह किसान
बस बोता है सौभाग्य को
जीवन के खेत में
प्रतिपालक की तरह
~गौतम
