झांसी घेर खड़ा शत्रु था
मचा हुआ था हाहाकार
साध अश्व को, साध पुत्र को
साध शत्रु को, कर ललकार
कभी अश्व को साध रही थी
साध रही थी आंधी को
सधे नेत्र थे, सधे पांव थे
सधी हुयी रानी की चाल
सधी कटार, सधी तलवारें
सधा हुआ प्रत्येक प्रहार
सधा हुआ वह अश्व निडर
रानी को साध रहा हर बार
कूद पड़ी थी दुर्गा बनकर
लेकर काली का अवतार
सधी दामिनी कड़क रही थी
सधे मेघ की प्रलयंकार
सधा काल, साधे धरती को
साध रहे थे बारंबार
एक एक कर रानी रिपु को
भेज रही थी यम के द्वार
रानी के नेत्रों से मानो
बरस रहा था गरम अंगार
सधा चरित्र, सधे आदर्श
सधा रानी का तन-मन था
मौन साधकर, साध ह्रदय को
साध रही जीवन की धार
प्राण भले न्योछावर हों पर
नहीं दासता थी स्वीकार
उसकी प्रखर वीरता की
इतनी बस अमर कहानी है
मेरे मन की दिव्य नायिका
बस झाँसी की रानी है!!
~गौतम @gautam0112


