घूँघटलाज का, शर्म का, इज्जत काशायद अनंत संवेदनाएंअनंत आँसूअनंत खुशियाँमोहनी मुस्कानलिए फिरती है स्त्रीपर कोई मोल नहीं इन भावों काजो पनपते हैं घूँघट मेंऔर यहीं विलीन हो जाते हैं