गरीबी हूँ, सियासत ने मुझे धनवान कर डाला 

सियासत के चुनावों ने मुझे भगवान कर डाला


मैं थी मजबूर, अंबर वस्त्र थे मेरे

पाँव भी लड़खड़ाते थे, मगर अभ्यस्त थे मेरे

किसी कूचे, किसी परदेश की मैं सेविका थी

किसी मजबूर के अरमान की मैं प्रेमिका थी

मगर इस भूख ने मेरा मकाँ सुनसान कर डाला

गरीबी हूँ सियासत ने मुझे धनवान कर डाला


देश में हो रहे दंगों की मारी हूँ 

पेट की आग से पनपी बीमारी हूँ 

किसी पूँजीपति का इश्क हूँ मैं 

दबी कुचली निगाहों का, दहकता अश्क हूँ मैं 

सियासत के दलालों ने मुझे नीलाम कर डाला

गरीबी हूँ सियासत ने मुझे धनवान कर डाला 


भूख से बिलखते बच्चों की, आँखों का मैं पानी हूँ 

सितम को ढो रही लंबी कहानी हूँ 

जेठ की दोपहर में तप रही हूँ 

शहर की मंडियों में बिक रही हूँ 

वक्त के हुक्मरानों ने मुझे बेजान कर डाला

गरीबी हूँ सियासत ने मुझे धनवान कर डाला 


कभी आकाश पाँवों में पहनकर

दिशाओं से खुले इस तन को ढककर

रात के तिमिर से बेसक लड़ी हूँ 

बदन कमजोर है फिर भी खड़ी हूँ 

शहर के बदजुबानों ने मुझे बेइमान कर डाला 

गरीबी हूँ सियासत ने मुझे धनवान कर डाला 


चुनावों के महोत्सव में मुझे सब पूजते हैं 

मेरी हालत, मेरे हालात भी तब पूछते हैं 

मगर फिर भी दबी कुचली, निरक्षर भीड़ हूँ मैं 

कभी बेबस, कभी बेघर विहग का नीड़ हूँ मैं 

निरंतर चल रहे इस सफर ने लाचार कर डाला 

गरीबी हूँ सियासत ने मुझे धनवान कर डाला 

                     ~गौतम