गाँव तुझे पुकार रहा है
ऐ पथिक! परदेश में
चिट्ठी मेरी पहुंचा जरा
गाँव की यादें लिखी हैं
खत उन्हें दे आ जरा
चंद रोटी, चंद कपड़े
और कुछ सपनों की खातिर
जिगर के टुकड़ों की बस्ती
शहर देखो जा रही है
गांव की बेचैन माटी
वापस उन्हें बुला रही है
सुन रखा है शहरों को
तूने ही खूब सँवारा है
तेरे खून पसीने से तर
हर ईंट और चौबारा है
गली गली बस्ती बस्ती
तेरी मेहनत से चमके हैं
चूड़ी, बिंदिया, पायल, कंगने
तेरी खातिर खनके हैं
तेरी प्रियतम की सरगोशी
कब से तुझे पुकार रही है
वापस आ जा देर न कर
अब बिटिया तुझे पुकार रही है
मालुम है तू भटक रहा
उन कंकरीट के जंगल में
तेरे सपने टूट रहे हैं
इन शहरों के दंगल में
रस्तों पर वह शांत फिजाएं
पीपल की छांव तुझे भाती थी
रंग बिरंगी तितली तेरे
कंधों पर यूँ इठलाती थी
सूनी आंखों से वह चौखट
तेरे लिए कराह रही है
कब से वह बूढ़ी अम्मा
ऐ लाल तुझे पुकार रही है
अब तो रहा नहीं जाता है
दिल मेरा ये घबराता है
पीपल, बरगद, चूड़ी, कंगन
माँ की ममता, सूना आंगन
घाट, गली, नदियाँ और पोखर
तेरा आंचल, तेरा काजल
बाबा के रोचक किस्से
दादी का सूना सूना आंचल
जिनसे ही यह गाँव बना है
देखो कितना प्यार रहा है
हाथ दोनों फैलाकर तेरा
गाँव तुझे पुकार रहा है!!
~गौतम ✍️ @gautam0112


