माँ तुम्हारे तन में पलकर
मैं बड़ी तो हो रही हूँ
तुम ही मेरा ह्रदय हो
जिससे लिपटकर रो रही हूँ
तुम हँसो तो मैं हँसी हूँ
तुम ही हो मुस्कान मेरी
तुम जियो तो मैं जियूंगी
तुम ही हो पहचान मेरी
जो हवा साँसे तुम्हारी
मैं उसी से जी रही हूँ
तुम जो पानी पी रही हो
वो मैं पानी पी रही हूँ
पर सुना है बेटियाँ
कुलदीप सी होती नहीं हैं
यह तुम्हारी जान भी
इस बात से सोती नहीं है
क्या मेरे सपने तुम्हारे
जेहेन में चुभने लगे हैं
और मेरी जिंदगी के
पल कहीं रुकने लगे हैं
और यह मैंने सुना है
बेटियाँ होती परायी
इसलिए ही तो नहीं
कल आपने नजरें चुरायी
जो मेरी माँ बोलती हो
गूँजता है मेरे मन में
जब सिसकती हो मेरा भी
दिल सिहरता है पवन में
और कोई कह रहा था
बेटियाँ दुर्भाग्य सी हैं
जो जला देंगी तुम्हें
उन जंगलों की आग सी हैं
डर रही हूँ जग की ऐसी
सोच से, मैं कांपती हूँ
क्या पता तुम मार दो
इस बात से मैं हांफती हूँ
क्या जहाँ में तुम मुझे
इस बात से आने न दोगी
जन्म से पहले मुझे
आकाश यह पाने न दोगी
क्या मेरे पंखों को माँ तुम
अब नहीं आकाश दोगी
मैं जियूँ और मैं बढ़ूँ
ऐसी नहीं क्या आश दोगी
डर रही हूँ माँ मुझे
क्या गर्भ में ही मार दोगी
फिर कहीं बेटा बनूँ
तो ही मुझे क्या प्यार दोगी???
~गौतम


