सांझ की आरती बनकर

जो पूजे घाट पर कोई 

दिशाओं को हवाओं से

मिला देना


जो मांगू मैं कोई मन्नत

तुम्हारे संग बहने की

मेरी इस धूल को

कंकड़ बना देना


छुऊं बनकर हवा और

डूब जाऊँ धार में तेरी

उसी मंझधार का उन्मुक्त सा 

तिनका बना देना 


जहाँ गंगा बहे, यमुना

तुम्हारी गोद में खेले

उसी तुम घाट का

पनघट बना देना


जहाँ अनुरक्ति पलती हो

पले अनुराग युग युग से

उन्हीं राधा किशन की मोहनी

सूरत बना देना


मैं लेकर जुगनुओं के दीप

भंवरों का मधुर गुंजन

पनपते पुष्प की भीनी

महक मुझको बना देना


ये जग है साक्षी, नभ और धरती

भी पुरातन से

प्रेम की रश्मियों से

दीप्त तेरा मन बना देना


जहाँ बसने की मेरी लालसा

युग युग तलक होगी

तेरे उस हृदय को पावन

प्रफुल्लित घर बना देना


~गौतम ✍️ @gautam0112