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बना देना

सांझ की आरती बनकर

जो पूजे घाट पर कोई 

दिशाओं को हवाओं से

मिला देना


जो मांगू मैं कोई मन्नत

तुम्हारे संग बहने की

मेरी इस धूल को

कंकड़ बना देना


छुऊं बनकर हवा और

डूब जाऊँ धार में तेरी

उसी मंझधार का उन्मुक्त सा 

तिनका बना देना 


जहाँ गंगा बहे, यमुना

तुम्हारी गोद में खेले

उसी तुम घाट का

पनघट बना देना


जहाँ अनुरक्ति पलती हो

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