जब तक पाँवों में छाले हों

बेशक दिल में पीड़ा उमड़े

या दर्द अनंत सँभाले हों

कदमों को थमने मत देना

ऐ नदिया बस बहते जाना


छलनी है दिल, छलनी है मन

छलता है सिंधु अगाध तुम्हें 

इस जग की प्यास मिटाने को

बहते जाना निर्बाध तुम्हें 

ये घाट, कपाट किनारों के

छूती उन मस्त बयारों के

आलिंगन को तुम आ जाना

ऐ नदिया बस बहते जाना 


कतरा कतरा, लम्हा लम्हा

उन्मुक्त बहो तुम अविरल सी

खेतों को सींचों और धरा

की तपन मिटाओ शीतल सी

तप त्याग और अनुराग लिए

अंजलि में नीर विराग लिए 

ऋषियों को पावन कर जाना

ऐ नदिया बस बहते जाना 


तुम संगम हो, तुम उत्सव हो

मानव के मन का उद्भव हो

इतिहास संजोकर रखा है

संस्कृतियों का तुम पल्लव हो

प्यासी, कुम्हलाई धरती की

पीड़ा का हल हर संभव हो

बस सदा सींचना इसी तरह

संस्कृति और मानवता को

जो आऊं तुम्हारे आंचल में 

हिरदय में अपने बसा जाना

ऐ नदिया बस बहते जाना 

~गौतम ✍️ @gautam0112