सदियों पुरानी दिवार जिसपर पपडियां जम गई है वक़्त की धूप और बारिश से हर रोज एक परत उतर जाता है जमीन पर। उस दिवार के एक कोने में दर्ज है प्रेमियों के नाम जो उन्होंने , इक शाम पत्थर से खखोरे थे जो, हर रोज मिटने से बच जाता है बारिश से लिपटकर धूप को ओढ़कर पत्थर पर उभरा नर्म प्रेम और भी गहरा होता जाता है। मैं भी उस दिवार सा हो गया हूँ यादें वक़्त की पपडियां दिल उस दिवार का छोटा सा कोना जहाँ दर्ज है, एक प्रेम का किस्सा गौरव