दिमाग अक्सर फंसा होता है इसी उधेड़बुन कि ये जो नशा है ये है सूरत का या सीरत का उनकी क्योकि अगर है नशा ये सूरत का तो महँगा पड़ेगा उसे उम्र भर सूरत ही तो है चमक ढल जाएगी जिसकी सूरज ढलता है जैसे फिर रह जाएगा बस बोझ वही बोझ जिसे ढोता रहेगा उम्र भर कोसेगा खुद की बेबसी को पर अगर ये नशा है उनकी सीरत का तब तो कहने ही क्या है एक निश्छल निरकपट रिश्ते का उद्घोष होगा शहनाइयां प्रेम के गीत गाएँगी ढोल नगाड़े गुण गान करेंगे उस मोह का जिसके चर्चे बरसों तक गाए जाएंगे जैसे प्रेम गाथा में चर्चे मुरलीधर के हुआ करते हैं। ~गौरव