मसले इस दिल के तुम्हे क्या ख़ाक समझाये
जब हम ख़ुद ही इन्हें समझ ना पाये,
उलझने मेरी सुलझाने की तो बात बड़ी दूर,
उन्हें मेरी इन उलझनों पे भी हंसी आये,
मैं जितनी मशकत् करूँ उसे समझने की,
वो उतने गरूर से और उलझती चली जाये,
ना इकरार करूँ तो साँसे रुके मेरी,
दरार दोस्ती में गर कहूँ तो आ जाये,
रूठने का सलीका सिखा ही नहीं मैंने,
बेग़ैरत दिल रूठ के ख़ुद ही मानी जाये,
कश्मकश में हो या फ़ितरत है तेरी,
मुँह बने इनकार करूँ मैं इकरार करूँ तो यूँ ही इतराये,
आज भी इसी उलझन में गुज़ारा दिन,
नींद मिले गर रात में याद ना तेरी आये,
कितना उलझूँ भूख और शर्म में,
आज फ़िर बच्ची मेरी भूखी सोयी,
जान बुझ के उलझा रहूँ तुझमें,
गर सुलझूँ तो नफ़रत हो जाये,
तेरे इन उलझे उलझे इशारों में,
मेरी सुलझी हुई जिंदगी फंसती जाये,
थी जो अनबन छोटी सी मेरे यारों में,
क्यूँ उस दलदल में यारी अपनी धँसती जाये,
उलझा है वो देखी तेरी सूरत जिसने,
सीरत दिखते ही सारा धुंआ छंट जाये,
- gavi

