#Inkit
मैं चुनने में लगा रहा इक गुलदस्ता गुलाबों का
पर इत्र उसको भाता था गुलज़ार की किताबों का
जिस तरफ़ नज़र डालूं हर चीज़ मरम्मत मांगे है
कुछ यूं खस्ता हाल है मेरा कारखाना ख्वाबों का
जाने क्यों पलड़ा भारी है, इस दिल के तराज़ू में
तेरे लबों से ज़्यादा , आंखों में मिले जवाबों का
देख के इन को दिल मेरा तहजीब में आ जाता है
आँखें हैं तेरी या फिर कोई शहर नवाबों का
जिसने भी मांगा उस पर जी भर के लुटाया खुद को
क्या गज़ब का ये गुनाह था सूखे हुए तालाबों का
यादों की मद्धम आंच पे पकता है दीदार तिरा
है सबसे उम्दा पकवान ,यही सपनों के ढाबों का
अनमोल तो फक़त उसकी याद ही थी" गवी" महफ़िल में
यूं आना जाना लगा रहा सस्ती महंगी शराबों का
औकात दिखा देंगे गमों को इक बार हमें तो चखो
गम बढ़ते गए पी कर , गुरूर टूट गया शराबों का
कहती थीं नाम बदल देना गर गम न भुला पायीं
यारों अब तुम ही कोई नाम बताओ शराबों का
