भर पेट जो उसकी अना को मैं खिलाता हूँ

ख़ुद भूखा रह कर फ़िर मैं रिश्ते ये निभाता हूँ

पढ़ कर वो जाने क्यूँ समझती ही नहीं आँखें

इज़हार क्या उर्दू में लिख आँखों पे जाता हूँ


हो मखमली चाहे बिछोना नींद रहती गुम

सोने को बस पल भर तिरी यादें बिछाता हूँ

भीगे मिरे गालों पे है बस नाम उसका

किस आस में मैं नाम पन्नों से मिटाता हूँ

रिश्वत् मैं देकर भीगी इन आँखों को नींदों की

मिलने उसे हर रात सपनों में बुलाता हूँ

  

-Gavi