लियो टालसटाय से किसी ने पूछा कि 20 वीं सदी ने दुनिया को क्या दिया?
उत्तर था - गांधी ।
गांधी पर चर्चा विशेषकर आज के कालखण्ड में बड़े ही साहस का काम है। आज का समय जब एक बच्चा जो ठीक से अपनी बहती नाक भी साफ नहीं कर पाता उसे भी गांधी को अपशब्द कहना सिखा दिया जाता हो, जब एक बड़ी आबादी इस पर सहमत हो चुकी हो कि गांधी नहीं गोडसे की जय कहना है। जनता का एक बड़ा भाग जब यह सवाल करे कि गांधी आखिर थे कौन जो उनकी बात की जाए। एक ऐसे समय जब हर ओर गांधी को बुरा-भला कहा जा रहा हो। देश की सभी समस्याओं के लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से गांधी को ही उत्तरदायी ठहराया जाता हो। नफरत और हिंसा की आग पर शीतल फुहार की तरह पड़ने वाले गांधी को ही आग लगाने वाला बताया जा रहा तब ऐसे समय में गांधी पर चर्चा करना और उनकी प्रासंगिकता बताना वास्तव में साहस का काम है। पर फिर भी उनके 153वें जन्मदिन पर यह शायद कहीं ज्यादा जरूरी हो जाता है कि आज के समय गांधी का क्या महत्त्व है हम इस पर विचार करें।
गांधी जी के 150 वर्ष पूर्ण होने पर तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद जी ने कहा था कि राष्ट्रपति पद पर रहते मैंने बहुत से देशों की यात्रा की और देखा कि पूरे विश्व में गांधी का कितना सम्मान है। उन्होंने कहा कि आज से 100 -200 सालों बाद गांधी और अधिक सम्मानित व पूज्यनीय हो जाएँगे। विचारणीय है कि ऐसा क्या कारण है कि जो व्यक्ति पूरे संसार में मानवता का, नैतिकता का, सत्य, अहिंसा का प्रतिनिधि बन चुका हो, उसके खुद के देश में आज बहुत थोड़े से लोग उसकी विचारधारा का समर्थन करते हों और आज तो ऐसे व्यक्तियों की कोई कमी नहीं जो उन्हें इस देश पर अभिशाप समझते हैं। उन पर कई आरोप बिना सोचे समझे तथ्यहीन रूप से लगा दिए जाते हैं जैसे सबसे पहला कि 1947 में गांधी जी विभाजन को क्यों रोक नहीं सके, क्यों उन्होंने देश के दो टुकड़े हो जाना स्वीकार कर लिया। एक आरोप लगता है कि जब विभाजन के बाद एक देश, एक धर्म के आधार पर बना तो दूसरा देश क्यों धर्मनिरपेक्ष रहा? गांधी विरोधी अगर बंटवारे को स्वीकार कर भी लेते हैं तो उन्हें यह स्वीकार नहीं होता कि भारत क्यों एक धार्मिक राष्ट्र नहीं बना। इसमें भी वे सबसे बड़ा रोड़ा गांधी जी को ही मानते हैं। एक हास्यास्पद आरोप लगता है कि नेहरू जी को प्रधानमंत्री बनाकर उन्होंने देश का बेड़ागर्क कर दिया। बहुत से लोगों का मत रहता है कि यदि नेहरू की जगह पटेल प्रधानमंत्री बन गए होते तो देश आज सोने की चिड़िया होती। ऐसे आरोपों की छाँव में देशभर में गांधी के खिलाफ एक माहौल बनाया जाता रहा है। उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास होता रहा है। उनकी महानता को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया जाता है। एक ऐसा माहौल बनाने का प्रयास होता है कि गांधी केवल एक वर्ग का ही ध्यान रखते थे।
ये तो तस्वीर का आगे का हिस्सा है जो आज आपको दिखाया जा रहा है। तस्वीर के वास्तविक और पिछले हिस्से को भी देखने की आवश्यकता है। किसी महापुरुष का कथन है कि – “व्यक्ति की मृत्यु बता देती है कि उसका जीवन कैसा था | ” जन्म तो जीवन का प्रारंभ होता है। यह एक सामान्य प्रक्रिया है। आपका जन्म निर्धारित नहीं करता कि आपका जीवन कैसा होने वाला है परन्तु आपकी मृत्यु पर संसार कैसी स्वाभाविक प्रतिक्रिया करता है कितना शोक मनाता है, यह बताता है कि आपका पूरा जीवन कैसा था। हाल ही में हनमे गांधी जी का 153 वां जन्मदिन मनाया। जन्मदिन पर मृत्यु की बात उचित तो नहीं पर उनकी मृत्यु पर संसार की प्रतिक्रिया कैसी थी, इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता हैं कि उनका जीवन कैसा था।
लुइ फिशर जो कि एक सुप्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार थे और जिन्होंने गांधी जी की जीवनी लिखी थी , वे अपनी पुस्तक गांधी की कहानी में लिखते हैं – गांधी जी की शवयात्रा में लगभग 10 लाख लोग सम्मिलित हुए थे। फिशर के शब्दों में –“यह आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी शवयात्रा थी। 30 जनवरी 1948 को जिस दिन गांधी जी की मृत्यु हुई , उस दिन वह वहीं थे जैसे सदा से रहे थे अर्थात एक साधारण नागरिक, जिनके पास न धन था, न संपत्ति ,न सरकारी उपाधि, न सरकारी पद, न विशेष प्रशिक्षण योग्यता, न वैज्ञानिक सिद्धि और न कलात्मक प्रतिभा फिर भी ऐसे लोगों ने जिनके पीछे सरकारें और सेनाएं थीं। इस अठहत्तर वर्ष के लंगोटीधारी छोटे से आदमी को श्रद्धांजलियां भेंट कीं।
विदेश से संवेदना के 3441 सन्देश प्राप्त हुए और ये सारे सन्देश बिन मांगे आए थे। गांधी जी एक नीतिनिष्ठ व्यक्ति थे और जब गोलियों ने उनका प्राणांत कर दिया तो उस सभ्यता ने जिसके पास नैतिकता की अधिक संपत्ति नहीं है। अपने आपको और भी अधिक दीन महसूस किया। प्रोफेसर अलबर्ट आइंस्टीन ने कहा – गांधी ने सिद्ध कर दिया कि केवल प्रचलित चालबाजियों और धोखाधड़ी के मक्कारी भरे खेल के द्वारा ही नहीं बल्कि जीवन के नैतिकता पूर्ण आचरण के प्रबल उदाहरण द्वारा भी मनुष्यों का एक बलशाली अनुगामी दल एकत्र किया जा सकता है। फ्रांस के समाजवादी नेता लियो ब्लम ने लिखा- मैं गांधी को नहीं जानता, मैंने उनके देश में कदम नहीं रखा पर फिर भी मुझे आज ऐसा लग रहा है कि मैंने कोई अपना खो दिया। सर स्टेफर्ड क्रिप्स ने लिखा –मैं किसी काल के और वास्तव में आधुनिक इतिहास के ऐसे किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं जानता जिसने भौतिक वस्तुओं पर आत्मा की शक्ति को इतने जोरदार और विश्वासपूर्ण तरीके से सिद्ध किया हो।” वास्तव में आधुनिक इतिहास के किसी व्यक्ति की मृत्यु पर इतना गहरा शोक नहीं मनाया गया |
उपन्यास शैली में और बहुत रोचकपूर्ण तरीके से लिखी गयी गांधी की कहानी से पाठक को क्या मिलता है। उसे मिलता है एक समाज सुधारक की पीड़ा। गांधी ने पूरे जीवन साम्प्रदायिकता से संघर्ष किया, अंतिम क्षण तक सांप्रदायिक आधार पर देश न बंटे इसका प्रयास किया। वे विभाजन को अंग-भंग मानते थे, पाप मानते थे पर लोग क्या मानते थे। लोग उन्हें दोषी मानते थे कि वे साप्रदायिकता को नहीं रोक पाए अर्थात जो व्यक्ति अपने जीवन भर साम्प्रदायिकता से लड़ता रहा अंत में वही दोषी करार दे दिया गया। वे असफल हो गए। रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा है – “मैं यह पहले से जानता था, जिस प्रकार ईसा मसीह असफल हो गए, जिस प्रकार बुद्ध और महावीर असफल हो गए उसी प्रकार गांधी भी असफल हो जाएँगे ”। एक समाज सुधारक का यही दर्द होता है। उसे सबकी घृणा मिलती है। पुस्तक कहती है कि गांधी के अंतिम समय में उनकी 90 प्रतिशत डाक गालियों से भरी रहती थी। हिन्दू उन पर आरोप लगाते थे कि वे मुस्लिमों का पक्ष लेते हैं। उसी गांधी पर जो सभी धर्मों के अध्ययन के बाद भी राम चरित मानस को भक्ति मार्ग की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक बताते थे। उन्हीं गांधी पर जिनके जीवन का निर्देशन ही कृष्ण की गीता से होता था। उन्हीं गांधी पर जिन्होंने गौरक्षा के लिए उसका दूध पीना तक बंद कर दिया था और उन्हीं गांधी पर जिनकी मृत्यु पर जिन्ना ने वक्तव्य दिया कि हिन्दुओं ने अपना सबसे बड़ा नेता खो दिया। मुस्लिमों की डाक में आरोप होता था कि वे पाकिस्तान के निर्माण में रुकावट डालना बंद कर दें। यही विडम्बना है सुधारक की। गांधी व्यथित थे। अपने जीवन के उतार में वे नेपथ्य में चले गए थे। वे निराश थे कि लोग लड़ना बंद क्यों नहीं करते और लोग उन्हें देव तुल्य तो मानते थे पर उनकी मानने को तैयार नहीं थे।
दिनकर ने कहा कि गांधी पराजित पुण्य के प्रतीक थे। उनकी महानता उनकी पराजय से फीकी पड़ गई पर समय के साथ यह फीकापन समाप्त हो जाएगा। गांधी जयंती पर उनको यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि उनको पढ़ा जाए। हिन्द स्वराज, सत्य के प्रयोग , मेरे सपनों का भारत , गांधी की कहानी जैसी पुस्तकें पढ़कर आप निश्चित हो सकते हैं कि गांधी गालियों के नहीं वन्दना के योग्य हैं। उनका जीवन वृत्त पढ़कर यह जाना जा सकता है कि दलितों के लिए, गरीबों के लिए शोषितों के लिए, पीड़ितों के लिए उन्होंने जीवन भर कितना संघर्ष किया। उन्हें अवश्य पढ़ें क्योंकि वे भारत के प्रतिबिम्ब थे। उन्हें अवश्य पढ़ें क्योंकि आप मानें या न माने दुनिया में आपके देश की पहचान गांधी से ही है।
किताब- गांधी की कहानी
लेखक-लुई फिशर (सुप्रसिद्ध अमेरिकी पत्रकार)
