लखनऊ। जिस जगह मेरा जन्म हुआ उस जगह से ठीक 30 किमी की दूरी पर बहुत साल पहले दो लड़कों का जन्म हुआ। अपने पिता से हनक के कुटने वाला आर्य परिवार का लड़का और दूसरा पठान पुलिसकर्मी का बेटा, दोनों मौत से बेखौफ, आज़ादी के लिए बावले और मुल्क से बेपनाह मोहब्बत करने वाले। इन लड़कों की जन्म से लेकर फांसी के फंदे को चूमने की कहानी सुनकर देह में एक सिहरन पैदा होती है। आज हिमांशु बाजपेई से तमन्ना-ए-सरफरोशी की दास्तान सुनकर वो सिरहन पैदा हुई। उन लड़कों का नाम था- रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक उल्ला खां।
हिमांशु बाजपेई की दास्तान सुनना कोई पतंग उड़ाने जितना आसान काम नहीं हैं। उनकी दास्तान रूह तक जाती है, उसे झंकझोड़ती है, सहलाती है और गर्म सलाखों से एक सवालिया निशान छोड़ जाती है जो लंबे समय तक रूह पर रह सकता है। सवाल कि हमारे पास क्या था, सवाल कि हमारे पास जो है क्या हम उसके लायक हैं, सवाल कि क्या हम ये अपनी अगली पीढ़ी को भी दे पाएंगे।
अगर अंग्रेजीदां बच्चे जो होटल मैनजमेंट का कोर्स कर रहे हैं, जो विदेशों में नौकरी का सपना देख रहे हैं, जिन्होंने मंच पर देशभक्ति के नाम पर ‘देश रंगीला’ और ‘कोई कहे कहता रहे हम को भी कितना दीवाना’ जैसे गाने सुने हों वो अगर बिस्मिल और अशफ़ाक को सुनकर रो दें तो मतलब काम की बात हो रही है। हिमांशु कोई खज़ाना नहीं हैं जिन्हें लखनऊ सहेज कर रखे बल्कि वो वह लोहबान हैं जिसकी खुशबू पूरी दुनिया में जानी चाहिए और तसल्ली होती है यह देख कर कि उनकी खुशबू अपने उरूच पर है।
34 साल के हिमांशु वाजपेयी देश के जाने माने दास्तानगोई कलाकारों में से एक हैं। दास्तानगोई यानी उर्दू में ख़ास अंदाज़ की लंबी कहानियां सुनाने की कला है। ये वाचिक परंपरा से जुड़ी कला है जो मध्यकाल में अपने शबाब पर थी। लेकिन 1928 के आस पास ख़त्म हो गयी। 2005 में उर्दू आलोचक शम्सुररहमान फ़ारूक़ी और उस्ताद महमूद फारूक़ी की कोशिशों से ये कला दोबारा ज़िंदा हुई। बाद के वर्षों में जो युवा जी-जान से इस कला से जुड़े उनमें हिमांशु वाजपेयी प्रमुख हैं। क़िस्सागोई को पूर्णकालिक व्यवसाय के बतौर मान्यता दिलाने में हिमांशु वाजपेयी ने अहम भूमिका निभाई है। पुराने लखनऊ के राजा बाज़ार इलाके में पैदा हुए और पले बढ़े हिमांशु वाजपेयी की शोहरत एक ख़ालिस लखनउवा शख़्स की है। वे लखनऊ के इतिहास, संस्कृति आदि को अपने ख़ास अंदाज़ में लोगों तक ले जाते हैं। उनके पास बेशुमार कहानियां हैं।
नई-पुरानी, छोटी-बड़ी, हंसाने वाली, रुलाने वाली...हर तरह की कहानियां। जब वे कहानी सुनाते हैं, तो समय, संवादों, चरित्रों और घटनाओं को जीवित कर देते हैं और सुनने वाले भी उसी कहानी के किरदार बन जाते हैं। काकोरी कांड और क्रांतिकारियों की दास्तान, गांधी जी की दास्तान, फलों के राजा आम की दास्तान, कैफ़ी आज़मी की दास्तान, आदि उनकी कुछ मशहूर दास्तानें हैं। हिंदुस्तान के अलग अलग शहरों में सत्तर से ज्यादा शो करने के अलावा वो तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात और सिंगापुर आदि में अलग अलग जगह पर कई शो कर चुके हैं।

