ज़िंदगी तुने अपना फ़र्ज़ अदा किया ही नही,

सफ़र में रक्खा सदियोंमुक़ाम लिखा ही नही।


चाहा बहुत के दिखाएँ उन्हें हाल--दिल अपना,

सुलगती रही आग उम्र भरधुवाँ उठा ही नही।


मुझे खिलाती रही ज़िंदगी खेल अपनी शर्तों पे,

मैं सीख़ आया जब सभी दावखेल हुआ ही नही।


तू भी कभी तो मुझ पे आसान हो  ज़िंदगी,

मुझसे भी रख मरासिम*, मैं सिर्फ़ बुरा ही नही।


मैं यहाँ मुंतज़िरथाना मिला वो मुझसे आकर,

आया वो लौट कर ऐसेजैसे आया ही नही।


मरासिम - Relations

मुंतज़िर - Expectant


- अलट