नज़्म - काजल और आँसू
आँखें भर आई थी
कोई बाँध दिल में टूटा हो जैसे
इंतेज़ार में थे आँसू पलकों के मिलने के
जैसे कोई इशारा हो बह जाने का
तभी पलक झपकाई थी उसने
एक मोती काजल को साथ लेकर
चलने लगा था गाल पे
ये देख दूसरे भी चल पड़े
पीछे थे सभी क़तार से
जैसे मंज़िल मालूम हो उन्हें
सिलसिला चलता रहा कुछ देर
उस बाँध का सारा पानी
सूख गया अचानक,
रह गईं थी इक आँख़री
बूँद पीछे
जो दूसरों की तरह बही नही
रुक गईं थी गाल पे।
हाथों से अपने हटा दिया तभी
लेकिन बूँद ने जैसे थाम लिया हाथ
जैसे कह रही हो फिर मिलने की बात
निशाँ साफ़ कर दिए गए,
आँखों में काजल पहले की
तरह सज गया,
होंठो को दबा कर मुस्कान बैठाई गईं
नही पढ़ सका कोई चेहरे की रुबाई
कितनी साफ़ आँखें हैं
कहीं से तो आवाज़ आई थी।
- अलट


