कहते हैं अब हमें भूल जाओकरो वादा जाते-जाते।

चंद मिनटों में घेर लियाताक में बैठे थे सन्नाटे।


दिल ने सोचा रोकें उनकोबातें कुछ तो बोलें उनको,

हम तो बेबस फूट पड़े थेशब्दों से कितना समझाते।


तुमको कैसे हक़ था इतनामुझपे ज़ोर चलाने का,

इससे जो ना समझा अब तकऔर भला क्या बतलाते।


हाथों को जब देखा हमनेकोई निशान ना तुमसा था,

होनी के होने पर आँखिर हम तुमको कैसे पाते।


कहने को आँखों में अब भी पाने की है प्यास मगर,

हार गये जब ताल्लुक़ हीजीत के वापस क्या लाते।


-अलट