चेहरे से मेरे जो हाज़िर है हाल छुपाऊँ कैसे?
ये जो रोज़ सपनों में आते हो दिखाऊँ कैसे?
भूलना भी अगर चाहूँ तो भूला नही जाता,
इक ज़िंदगी है इनमें, ख़त तेरे जलाऊँ कैसे?
उधड़ चुकी है बुनाई तेरे सभी वादों की दोस्त,
इन आँखों के लिए नए ख़्वाब सिलवाऊँ कैसे?
अब के मुझे होना है बेचैन तो बेचैनी सही,
मैं जीत तो नही सकता मगर हार जाऊँ कैसे?
उम्र कट रही है यूँ “अलट” बेवजह कब से,
कर दे मेरा हिसाब ज़िंदगी तुझे समझाऊँ कैसे?
- अलट


