ज़िंदगी:
गंगा घाट की अज़मत और
पाक गंगाजल की कलकल
देती है शांती सुबह और शाम
मंदिर के घंटों की आवाज़ और
अजान से गूँजती सुबहों बनारस,
बस मस्तक झुका देती उसके धाम
गजरों की भीनी ख़ुशबू से
महकती शामें अवध
बस इठला उठती है हर शाम
कभी घुटती थी सिल बट्टे पर
छनतीं थीं मलमल में भर भर जाम
जीवन की कहानी
भी कुछ ऐसी ही है
प्रेम से घुटती तो कभी
दर्द में छनती सुबह-शाम
अवधी न मायूस होना तुम
हर शबे तारीकी की
होती है सुबह आम
अभय”अवधी”
यू एस ऐ
