विछोह और तलाश :

अब न वो खुलूस है और न वो एहतराम है

जहाँ हर शख़्स अब अनजान है

जहाँ मौजें साहिल से टकराती थी

अब वो दरिया भी उदास है

जहाँ कभी दोपहर साँझ से मिलती थी

अब वो पहर भी सुनसान है

गफ़लत में  आईने में खोजता हूँ तुझको

न दिखता अक्स मेरा न मिलती तेरी पहचान है,

थक गया हूँ शिद्दतें -तलाश में तेरी ,

अवधी किस से पूछे तेरा पता जब बस्ती ही वीरान है

अभय ‘अवधी ‘

यू एस ऐ