आशा:

वक़्त से गिरे लम्हे को उठाकर देखो

कितनी सिसकियाँ  और अश्क़ मिलेंगे

वक़्त की किताब का ये लम्हा वो सफ़ा है,

जिसे पलटकर देखो तो कितने दर्द मिलेंगे

इन दर्द भरे पन्नों को ज़रा ग़ौर से देखो

तो न जाने कितने जीवन के सार मिलेंगे

इनके हर लफ़्ज़ के आईने में झाँको

तो अनेकों सुनहरे  ख़्वाब दिखेंगे

इन ख़्वाबों के ख़ज़ाने में ढूँढोगे तुम

तो हक़ीक़तों के कोह मिलेंगे

इन ख्वाबों की माला को पहनो

अवधी, तो उम्मीदों के पैग़ाम मिलेंगे

अभय ‘अवधी’

USA