बीती विभावरी भोर का आग़ाज़ है
रात के ख़ुमार का अभी भी एहसास है
उसके रुख़सार की लाली अभी भी लाल है
लबों की मिठास अभी भी याद है
मेरे हर ख़याल की इब्तिदा वहाँ है
उसके होने का एहसास जहाँ है
उसका ख़्वाब में आना नेएमत है
क्या ‘अवधी’ इस ख़्वाब की तामीर के लिए तैयार है
अभय’अवधी’
