उसको पाने की हसरत में जाँबाज़ बने हम

सामने जब आया वो ,तो कुछ न कह् सके हम

एक ख़्वाब में देखा, दरिया में खड़े हम

उसकी आती हुई कश्ती को न रोक सके हम

वो लम्हा ख़ुशनुमा था जब साथ चले हम

अब ज़िंदगी की राह में तनहा खड़े हम

ये सच हैं कि हर नदी समंदर में सिमटती है

पर तू वो सागर है जिसमें न मिल सके हम

अभय ‘अवधी’