मेरी हर बात में तुम्हारी बात होती हैं, मेरी कविताओं की तुम्ही-से शुरुआत होती हैं, कौन हो तुम? कभी सूरज का तेज बनकर सुबह-सुबह उठाते हो, कभी शाम की हवाओं में बहकर बालों को सहलाते हो, कौन हो तुम? क्या तुम वो सागर हो जिसकी लहरें मेरे पैरों में झुमती हैं? या फिर वो बरसात हो जिसकी बूंदे मेरे गालों को चूमती हैं? कौन हो तुम? एक साँया बनकर सपनो में आते हो पास आते ही, अंधेरो सिमट जाते हो, एक आवाज़ बनकर बुलाते हो मेरे मुड़ते ही, एकाएक चुप हो जाते हो, आखिर कौन हो तुम? क्या तुम वो हो जो जिस्म में लाल-लाल सा बहता हैं? या तुम वो हो जो सिर्फ एक ख्याल बनकर रहता हैं? मैं जान गई, तुम बस एक ख्याल हो, तुम बस एक सोच हो | मेरे अकेलेपन में आते हो, भीड़ देख कर छुप जाते हो | तुम बस एक सोच हो, एक हसीन सोच हो | तुम्हारा-मेरा साथ मेरी आखिरी सांस तक रहेग, जब मैं न रही तुम भी नहीं रहोंगे|