उजली, धुली, चमकती धूप,

छत पर है उतरी-उतरी |

खिड़की की सलांखों से,

मेरे घर में है बिखरी-बिखरी |


बलखाती और इठलाती,

चलती है यूँ पुरवाई |

मानो कारी रात के बाद,

हुई सुबह निखरी-निखरी |


भीना-भीना, मीठा सा,

लोरी सा कुछ सुनता है,

जैसे घोल रहा है कोई,

कानों में मिसरी-मिसरी |


मेरी बगिया के भँवरे भी,

गीत नया सा गाते हैं |

जैसे बजती हो वृन्दावन में,

किसना की बसुरी-बसुरी |


उजली, धुली, चमकती धूप,

छत पर है उतरी-उतरी |

खिड़की की सलांखों से,

मेरे घर में है बिखरी-बिखरी |