आज पिटाया है , भीतर अहम चोट खाया है,
मिठास भरा फिर तर्क गढ़ा , वासना खिंचना चाहता है,
कर रहा बेहोश ये बार बार , कहां आज डूबो कर लाया है?
इस पल का इंतजार , डूबा मन तेरा ख्याल ,
तुझे सामने से देखा , इस बार तुझे कूड़े फेका,
कर , जितना कर सकता परेशान , तू कल्पना ना तेरा कोई निशान,
अगली बार भी आना ना है कोई डर , तूने बहुत सिखा दिया अनुभव देकर।
~ गणेश मिश्रा
