साथी का विचार घूमता है,
और साथी नही करुंगा कहा है,
क्योंकि मिलेगी नहीं जो पूर्ण है,
देखा जितना भी अभी निपूर्ण है।
उसे देखना मुश्किल है,
वो कहती नही , होती है,
उसे होना ना होना कोई फर्क नहीं,
पहचानने का बोध या पात्रता,
दर्शा देता है हवा का आद्रता।