है ऐसा मनुष्य जो मरते वक्त अंगार उगलते हैं
हम उनको अपने कंधों पर ले कर चलते हैं
हम उनके आर्दशों पर अपनी नींव रखते है
हम उनके आगे के जीवन को और पैना करतें है
बिना प्रलय ना साहित्य उगते हैं
बिना घिरे ना आभा जगती है
जग जाये तो फ़ूहड़ है
कैसे भी जगे
हम अपने जीवन के महत्व को ओछा कहते है
बहादुरी, समझदारी से रिश्ता रखते है
ना फ़ूहड़ कहते और सुनने से मतलब रखते हैं
हम सीमाओं के ही खिलाफ अपना मत रखते है।
