एक बेचैनी होती है भीतर ,
पहले अज्ञात था ठीक था ,
मैंने ही उसे जगाया ,
वो मुझमें था भरमाया ,
लगता था मगर पराया ,
कभी अनजाने या जाने में ,
मैं उस ओर कदम बढ़ाया।

ये विद्रोह न कभी हुआ था अनजाने में ,
चलता था मैं अपने मनमाने में ,
तब से एक कुण्ठा रहती मुझे सताते ,
मैं जहां फिसला कि लगती मुझे जगाने।