क्या कुछ हो गया अन्तराल में ,
चल रहा अभी भी माया चाल मैं ,
सांत्वना देता आया उसके गुमान से ,
ज़रा ठहरा होता , तो लेता दरमियान हाल मैं ,
क्या कुछ ना हुआ अन्तराल में ।
कहीं गुरूर ताने , फिर लगता पछताने ,
कितनें करवट मेरे , घट-घट लागे डेरे ,
ऊंच भाल अस्थिर कपाल , बेचैनी घेरे ,
लेप दिया हर खेप जहां देखा अंधेरे ।
