हूं मैं नासमझ ,
पर जताना चाहता हूं की मैं ही समझ हूं,
एक सिरा से दूसरे को ,
पकड़कर रखने वाला मैं ही हूं।
शिक्षक और शिष्य एक ही है,
पर इसमें भी द्वन्द करता हूं,
भाव भारी है अभी बहुत,
परन्तु अब भी मैदान ना छोड़ता हूं।
कुछ अपने हाथ में नहीं,
सब कुछ अपने हाथ में है।
