अपना दुख-दर्द बाँटें तो बाँटें कहाँ
जो अपना था अब वो अपना कहाँ,
हमने ज़िंदगी में वफ़ाई का पन्ना शुरू किया
उनको उनका उन्वान पसंद कहाँ,
हमने उनको देखा दिन-रात यूंहीं
उनको दूसरों को देखने से फुरसत कहाँ,
शायद मुकम्मल न होना सजा होती है इश्क़ की
उनको इश्क़ की कदर थी ही कहाँ,
ज़माने में बहुत हैं उनके जैसे लेकिन
'अलिख' तुमको जो चाहिए वैसा कहाँ
