मैंने तुमसे पहले कभी नहीं कहा लेकिन तुमसे भी पहले मेरी प्रेमिकाएं थी। मैंने बस प्रेम किया बिना किसी शर्त के। बिना वापस प्रेम मांगे और कई बार तो प्रेम किया बिना अपनी प्रेमिकाओं को बताए भी। 


मैंने तुमसे पहले कभी नहीं कहा मेरी दूसरी प्रेमिकाओं से पहले स्पर्श के बारे में। तुम्हारे स्पर्श से कभी कभी मुझे मेरा अतीत याद आता है। प्रेम होना स्वाभाविक है, अनिश्चितता है, संयोग है लेकिन उसको अपनाना संयोग नहीं, पूरी तरह से सोची समझी रणनीति है। प्रेम करना साधना जैसा है; प्रेम वंदना है। प्रेम सत्य है।


अगर सत्य की बात आती है तो ये एक कथन प्रकट हो जाता है कि "सत्य कड़वा होता है।" 

क्या प्रेम में कड़वाहट होती है? 

क्या प्रेम कड़वा होता है? 

नहीं; प्रेम कोई गणित का प्रमेय नहीं। प्रेम तो संतुष्टि देता है। प्रेम मनुष्य को समृद्ध और सरल बनाता है। प्रेम लोगों को जोड़ता है।


यदि शून्य के आविष्कारक आर्यभट्ट और अनंत के आविष्कारक श्रीनिवासन रामानुजन एक साथ अपनी प्रेमिकाओं से प्रेम करते तो वो बताते कि प्रेम करना, शून्य से अनंत तक की दूरी तय करना होता है। 


मैंने अपनी अन्य प्रेमिकाओं से जाना कि प्रेम के अनेक रंग होते हैं और तुमसे जाना कि प्रेम लाल होता है। मैंने हमेशा तुम्हारे चेहरे की लाली में प्रेम देखा है। जब तुम अपने होंठों पर मध्धम रंग की लाली लगती हो तो उसमे लाल इश्क़ झलक रहा होता है। जब तुम्हारे कानों के झुमके झूले झूल रहे होते हैं तो ऐसा प्रतिक होता है कि मेरे गाँव के खेतों में गेहूं के पौधे पककर लहलहा रहे हैं। जब तुम मुस्कुराती हो तो ऐसा महसूस होता है जैसे अभी सुबह की ठंडी हवाएं गुज़र रही हैं। तुम्हारी पलकों के झपकने से मैं अपने हृदय की गति को महसूस करता हूँ।


मैंने अपनी अन्य प्रेमिकाओं से प्रेम के अनेक रंग और तुमसे अपने हृदय के होने के पता लगाया। तुम्हारे प्रेम ने मुझे मेरे अतीत से जोड़ा। तुम्हारे प्रेम से मैंने ख़ुद को जाना। यथार्थ प्रेम को जाना।


~"अहमद"