महबूबा,


आज मैं तुम्हारे कूचे में आया था। बेख़्याली मुझे कब तुम्हारे कुचे के रास्ते पर ले गयी पता नहीं चला। आज मैंने तुझे रक़्स करते हुए तुम्हारे ही घर के आंगन में देखा। मैंने ख़ुद को देखा।


मैंने देखा कि एक फ़कीर, अपने कश्कोल में मोहब्बत के दाने लिए शहज़ादी के दरबार में हाज़िर हुआ है वही कश्कोल लिए जो शहजादी ने उसे थमाया था। शहजादी अपने रक़्स में डूबी हुई है। फ़कीर ने अपना कश्कोल वहाँ मौजूद शहज़ादे को मारकर तोड़ दिया। शहज़ादी रुक गई। कश्कोल से मोहब्बत के दाने बिखर गए। फ़कीर गमज़दा लौट गया।



तुम्हारा,

अल्हड़ महबूब