माँ मैं डर गयी हुँ इस ज़माने से,
ये नहीं मानेंगे मनाने से,
मैं तो बच्ची हुँ बस हंसना आता है मुझे,
आ जाती हुँ मैं बस हंस के बुलाने से,
माँ मैं डर गयी हुँ...
खुदा से चाहती हुँ मैं ये पूछना,
क्या फ़ायदा है बेटीयाँ बनाने से,
क्यों नहीं बनाया लड़का हमें भी,
क्या मिला खुद को हमें आज़माने से,
माँ मैं डर गयी हुँ.....
ये तो मर्द हैं जी चाहेगा कुछ भी करेंगे,
माँ कुछ भी नहीं होगा तेरे घबराने से,
कभी तो मैं मेरे घर में ही महफूज़ नहीं,
डरती हुँ कभी कभी अपने ही फ़साने से,
माँ मैं डर गयी हुँ....
सब कहतें हैं बेटीयाँ इज़्ज़त हैं घर की,
क्यों नहीं मिलता तहफ़्फ़ुज़ मुझे मेरे ही घर जाने से,
पूछता है "अहमद" म_आशरे के हकीमो से,
क्यों डरती हैं बेटियां अपने ही ज़माने से,
माँ मैं डर गयी हुँ....