बोलती हूँ बहुत फिर ,यकायक चुप हो जाती हूँ।  कभी ग़ुस्से में आकर, जोरों  से चिल्लाती हूँ  फिर मौन का लेकर सहारा , मीच कर आँखे  जी भर आँसू बहाती हूँ. कभी दीवार, कभी तकिया , कभी उसके सीने में घुस कर  दर्द कितना है  , बिन शब्दों के बताती हूँ।  सुनता है वोह चुपचाप, फिर सीने में छुपाता है  प्यार कितना है मुझसे ,उसका चेहरा बताता है।  जानती हूँ सब, फिर भी जाने क्यों सताती हूँ  हर एक जख़्म पर अपने, छुरियों से मरहम लगाती हूँ।  खोलकर देखती हूँ ऑंखें , जोर से मीच लेती हूँ  कुछ याद रखती हूँ, कुछ सुबह तक भूल जाती हूँ कभी रंगो से दिन भरती , कभी सियाह करती हूँ  थोड़ा जीती हूँ रोजाना , थोड़ा सा रोज मरती हूँ!