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थोड़ा जीती हूँ रोजाना, थोड़ा सा रोज मरती हूँ

बोलती हूँ बहुत फिर ,यकायक चुप हो जाती हूँ।  कभी ग़ुस्से में आकर, जोरों  से चिल्लाती हूँ  फिर मौन का लेकर सहारा , मीच कर आँखे  जी भर आँसू बहाती हूँ. कभी दीवार, कभी तकिया , कभी उसके सीने में घुस कर  दर्द कितना है  , बिन शब्दों के बताती हूँ।  सुनता है वोह चुपचाप, फिर सीने में छुपाता है  प्यार कितन
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