
बोलती हूँ बहुत फिर ,यकायक चुप हो जाती हूँ।
कभी ग़ुस्से में आकर, जोरों से चिल्लाती हूँ
फिर मौन का लेकर सहारा , मीच कर आँखे
जी भर आँसू बहाती हूँ.
कभी दीवार, कभी तकिया , कभी उसके सीने में घुस कर
दर्द कितना है , बिन शब्दों के बताती हूँ।
सुनता है वोह चुपचाप, फिर सीने में छुपाता है
प्यार कितन
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