चलो आज फिर अपनी कहानी कह दें , सुने न सुने कोई अपनी जुबानी कह दें हर अल्फाज में दर्द को छलकने दें , गुज़र चुके हर परेशानी कह दें। काश की कम होते दर्द कहने सुनने से, तो हर इक शख़्स को हम अपनी कहानी कह दें। लिए फिरते है जो सामानों गम , उतारें और तेरी निशानी कर दे। चलो आज फिर अपनी कहानी कह दें।